Wednesday, 15 July 2015

वो भी क्या दिन थे

सुबह होते ही घड़ी की सुइयां और मोबाइल पर वाट्स ऑप मैसेज या मिस्ड कॉल देखने की आदत पड़ गई है। और अगर इस दौरान कोई गड़बड़ी हो गई तो दिमाग तनाव से भर जाता है। वैसे ये बात तो मै भी मानती हूँ की कुछ बाते मन में एक गहरी छाप छोड़ जाती हैं लेकिन गलती से ही सही अगर आपके चहरे पे मुस्कान आ गई तो एक झटके में आप अपनी तकलीफ भुल जाते हैं।अब अाप सोच रहे होंगे कि बात कहां की कहां जा रही है। दरअसल इस भाग दौड़ वाली जिदंगी में हम खुद को कहीं खोते जा रहे हैं। मुझे आज तक समझ नहीं आया की आखिर हम काम करने के लिए जीते है, या जीने के लिए काम करते हैं। बचपन में सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल था कि बड़े होकर क्या बनना चाहती हो। शायद उस सवाल का जवाब अब जाकर मिला कि बड़े होकर फिर से बच्चा बनना हैं। शायद इस लिए ही हमसे हमारी pencil छीन के pen पकड़ा दी जाती है, कि अब हम गलतियां कर के उसे मिटा नहीं सकते। अब जाकर पता लगा की पापा के पैसो से शौक पूरे हुआ करते थे, अपने पैसो से तो बस जरूरतें पूरी हुआ करती हैं। दुनिया भर के लोग ये जानने में लगे हैं की मंगल गृह पे जीवन है या नहीं लेकिन किसी को क्या ये पता है की जीवन में मगंल है या नहीं। जिदंगी एक Auto driver की तरह हो कर रह गई है, सफर भी लम्बा है और जाना भी कहीं नहीं। वो भी क्या दिन थे जब हम बच्चे थे।

No comments:

Post a Comment

About

I want to do it all.. I also want to do absolutely nothing!!

I am still discovering who I am, but at twenty I still have plenty of time for discovering, don’t you think?

Blogging is that passion that lit a spark on that dream of mine which made a place where I could share myself with others but sooner or later I realized that my real dream was helping others be heard by lending them a voice. Discipline is the art which I want to master. I feel myself like a Taxi Driver who is completely absurd regarding her destination yet retaining my “INNOCENCE”.